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प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश जी की कहानी हिंदी में

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गणपति बप्पा मोरिया

यहां आपको गणेश जी की कहानी (Ganesh Ji Ki Kahani) और Ganesh Ji Ki Katha पढ़ने को मिलेगी जिससे आपको बाल गणेश की लीला के बारे में पता चल सके और आप थोड़ा ज्ञान प्राप्त कर सको।

आज हम हिन्दू धर्म के भगवान गणेश जी की कहानी के बारे में बात करेंगे। मैंने पढ़ा था कि हिन्दू धर्म के 3 लाख देवी एवं देवता हैं। उन 3 लाख देवी देवता में से आज हम गणेश जी की जिन्दगी के कुछ खास लम्हों पर गौर फरमाएंगे और फिर आप चाहे तो उसको कहानी के तौर पर अपने बच्चों को सुना कर उनको याद भी करा सकते हैं।

आज कल के बच्चों को मोबाइल और लैपटॉप चलाना बहुत ही छोटी उम्र में आ जाता है लेकिन उनमें से कुछ को ही प्रभु के नाम मालूम होते हैं। क्या आपको नहीं लगता की वो भी जरूरी है?

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वैसे तो देवी एवं देवता जन्म से ही भगवान होते हैं और उनको तभी से बहुत सारी शक्तियां भी होती है, लेकिन ज्यादातर भगवान अपने जवानी के शरीर या उम्र को प्राप्त करने के बाद देवी एवं देवता बन कर सब के सामने आए। वही गणेश ही बचपन में ही प्रभु के रूप में सबके सामने आ गए।

बच्चों को यदि आप पहली कहानी सुनाना शुरू करेंगे तो, आप इस बात पर ध्यान दीजिए कि उनको खास कर किस बात पर ज्यादा अच्छा लग रहा है और फिर अगली बार से आप उसी से संबंधित कहानी सुनाएं इससे उनको और जल्दी चीजे याद होगी।

चलिये, तो अब मैं आपको बता दूँ की यहाँ आपको प्रभु गणेश जी की जिंदगी से जुड़ी 7 कहानियां जानने को मिलेंगी, जिसको की आप आसानी से याद रख सकते हैं। तो चलिये शुरू करते हैं.

बाल गणेश जी की कहानी हिंदी में

Ganesh Ji Ki Kahani in Hindi

गणेश जी के शुरू के दिनों से अर्थात जब से उनका जन्म हुआ था तब से| तो पहली कहानी उनकी कुछ इस तरह से है:-

गणेश जी के जन्म की कहानी

एक दिन पार्वती माता स्नान करने के लिए जा रही थी लेकिन वहां पर उनके लिए कोई भी रक्षक उपस्थित नहीं था| इसलिए उन्होंने चंदन के पेस्ट से एक लड़के को अवतार दिया और उसका नाम गणेश रखा.

माता पार्वती नें गणेश को आदेश देते हुए कहा की उनकी अनुमति के बिना वो किसी को भी घर के अंदर ना आने दें| उस समय माता पार्वती के पति प्रभु शिव जी किसी काम से कही बाहर गए हुए थे.

जब शिवजी वापस लौटे तो उन्होंने देखा की द्वार पर एक बालक खड़ा है, उन्होंने सोचा शायद खेलते-खेलते वहाँ युही आ गया हो| जब वे अन्दर जाने लगे तो उस बालक नें उन्हें रोक लिया और नहीं जाने दिया.

यह देख शिवजी क्रोधित हुए और अपने सवारी बैल नंदी को उस बालक से युद्ध करने को कहाँ पर युद्ध में उस छोटे बालक नें नंदी को हरा दिया.

अक्सर कहानियों मे आपने सुना ही होगा की शिव जी को जल्दी क्रोध आ जाता था और गणेश को जीतता हुआ देख कर भगवान शिवजी को फिर से क्रोध आ गया और उन्होंने उस बाल गणेश के सर धड़ से अलग कर काट दिया.

इतने में माता पार्वती वापस लौटी तो वो बच्चे का सिर अलग हुआ देख बहुत दुखी हुई और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी| शिवजी को जब पता चला की वह उनका स्वयं का पुत्र था तो उन्हें भी अपनी गलती का एहसास हुआ.

शिवजी नें पार्वती को बहुत समझाने की कोशिश की पर वह नहीं मानी और गणेश का नाम लेते लेते और दुखित होने लगी| पत्नी को दुखी देख शिवजी भी दुखी हो गए.

अंत में माता पार्वती नें क्रोधित होकर शिवजी को अपनी शक्ति से गणेश को दोबारा जीवित करने के लिए कहा| शिवजी बोले – “हे पार्वती में गणेश को जीवित तो कर सकता हूँ पर किसी भी अन्य जीवित प्राणी के सीर को जोड़ने पर ही|”

माता पार्वती रोते-रोते बोल उठी की मुझे अपना पुत्र किसी भी हाल में जीवित चाहिए| अब भला पत्नी की बात का वो मान कैसे नहीं रखे और तभी उन्होंने नंदी को आदेश दिया – जाओ नंदी इस संसार में जिस किसी भी जीवित प्राणी का सीर तुमको मिले काट लाना|

जब नंदी सीर खोज रहा था तो सबसे पहले उससे एक हाथी दिखा तो वो उसका सीर काट कर ले आया.

भगवान शिव नें उस सीर को गणेश के शरीर से जोड़ दिया और गणेश को जीवन दान दे दिया.

शिवजी नें इसीलिए गणेश जी का नाम गणपति रखा और बाकि सभी देवताओं नें उन्हें वरदान दिया की इस दुनिया में जो भी कुछ नया कार्य करेगा पहले ! जय श्री गणेश को याद करेगा.

तो दोस्तो यह थी प्रभु गणेश जी के जीवन के समय की हुई घटना जिसको की मैंने एक कहानी के रूप में तब्दील किया था, कैसी लगी आपको ये कहानी कमेंट के माध्यम से बताना मत भूलिएगा.

चलिये अब दूसरी कहानी की और चलते हैं:-

जरुर पढ़े ⇓

Best Lord Ganesha Story in Hindi – Ganesh Ji Ki Kahani in Hindi

अक्सर आपने सुना होना की गणेश जी शरारती किस्म के बालक थे तो आइये अब एक दो कहानी उनकी शरारतों से जुड़ी भी पढ़ते हैं| यकीनन ही यह आपके बच्चो को जरूर पसंद आएगी.

गणेश जी के बचपन की कहानी – गणेश जी की कहानी

एक बार गणेश जी कुंबेर से मिले थे और उनको एक सबक सिखाया था, आइये जानते हैं कि क्या हुआ था और गणेश जी ने उनको कैसे सबक सिखया था.

Ganesh Ji aur Kuber Ki Kahani – गणेश कुबेर की पौराणिक कहानी

गणेश जी की कहानी हिंदी में

एक बार की बात है, धन के देवता कुबेर को अपने ऊपर बहुत घमंड हो गया, की वो इस दुनिया के सबसे अमीर देवता हैं| अपने धन का वैभव दिखाने के लिए एक बार इन्होने एक शानदार भोज (पार्टी) रखी, और सारे देवताओं को उसमे आमंत्रित किया|

उन्होंने भगवान् शिव को भी आमंत्रित किया, लेकिन किसी कारण वश शिवजी नहीं जा पाए और उन्होंने अपने घर से अपने छोटे बेटे गणेश जी को वहाँ जाने को कहा.

पिता की आज्ञा का पालन करते हुए गणेश जी वहाँ चले गए और फिर क्या था, वहां जाकर गणेश जी ने भोजन (डिनर) करना शुरू किया, और देखते-देखते उन्होंने सारा का सारा भोजन समाप्त कर दिया.

इतने में भी गणेश जी की भूख ही न मिटे, और उन्होंने वहां रखे हुए बर्तनों को भी खाना शुरू कर दिया| जब बर्तन भी नहीं बचे तो पूरे अलकापुरी (कुबेर सिटी) शहर में जो कुछ भी मिला उसे ही खा गए.

अब कुछ बचा नहीं खाने को, तो वो कुबेर को ही खाने के लिए उनकी तरफ दोड़े| फिर क्या था, अपनी जान बचाने के लिए कुबेर ने हिमालय पर्वत पर भगवान शिव की शरण ली, और कहा मुझे गणेश जी से बचाओ|

भगवान शिव ने एक कटोरे में थोड़े से उबले हुए चावल गणेश जी को दिए और तब जाकर उनकी भूख मिटी| बस गणेश जी ने ये सब कुबेर को सबक सिखाने के लिए किया.

कैसी लगी ये कहानी? अपने प्यारे-प्यारे कमेंट जरूर करें जिसका मै इंतज़ार कर रहा हूँ.

दोस्तो आपने देखा होगा की गणेश जी की फोटो में एक चूहा भी साथ जरूर बना होता है, या फिर आपने सुना होगा कि चूहा गणेश जी की सवारी है| क्या आपको उसके पीछे की कहानी पता है, यदि नहीं तो आइये जानते हैं.

जरुर पढ़े : चाँद को गणेश चतुर्थी के दिन क्यों नही देखा जाता है?

चूहे और गणेश जी की कहानी – Story of Bal Ganesh in Hindi

एक बहुत ही भयंकर असुरों का राजा था गजमुख| वह बहुत ही शक्तिशाली और धनवान बनना चाहता था, वह साथ ही सभी देवी-देवताओं को अपने वश में करना चाहता था इसलिए हमेशा भगवान शिव से वरदान के लिए तपस्या करता था.

शिवजी से वरदान पाने के लिए वह अपना राज्य छोड़ कर जंगल में जाकर रहने लगा और शिवजी से वरदान प्राप्त करने के लिए, बिना पानी पिए भोजन खाए रात दिन तपस्या करने लगा.

कुछ साल बीत गए, शिवजी उसके अपार तप को देखकर प्रभावित हो गए और शिवजी उसके सामने प्रकट हुए.

शिवजी नें खुश होकर उसे दैविक शक्तियाँ प्रदान किया जिससे वह बहुत शक्तिशाली बन गया.

सबसे बड़ी ताकत जो शिवजी नें उसे प्रदान किया वह यह था की उसे किसी भी शस्त्र से नहीं मारा जा सकता| असुर गजमुख को अपनी शक्तियों पर गर्व हो गया और वह अपने शक्तियों का दुरुपयोग करने लगा और देवी-देवताओं पर आक्रमण करने लगा.

मात्र शिव, विष्णु, ब्रह्मा और गणेश ही उसके आतंक से बचे हुए थे| गजमुख चाहता था की हर देवता उसकी पूजा करें| यह सब देख कर शिवजी नें गणेश को असुर गजमुख को यह सब करने से रोकने के लिए भेजा.

गणेश जी नें गजमुख के साथ युद्ध किया और असुर गजमुख को बुरी तरह से घायल कर दिया| लेकिन तब भी वह नहीं माना| उस राक्षक ने स्वयं को एक मूषक के रूप में बदल लिया और गणेश जी की और आक्रमण करने के लिए दौड़ा.

जैसे ही वह गणेश जी के पास पहुंचा गणेश जी कूद कर उसके ऊपर बैठ गए और गणेश जी ने गजमुख को जीवन भर के मुस में बदल दिया और अपने वाहन के रूप में जीवन भर के लिए रख लिया|

बाद में गजमुख भी अपने इस रूप से खुश हुआ और गणेश जी का प्रिय मित्र भी बन गया|

दोस्तो एक वर्त या त्योहार के बारे में आपने सुना होगा – गणेश चतुर्थी| आइये जानते हैं कि इस व्रत की शुरुआत कब से कैसे हुई.

गणेश चतुर्थी के व्रत की कहानी – गणेश चतुर्थी के व्रत की कथा

एक बार की बात है सभी देवता किसी कारण बहुत ही मुश्किल में थे। सभी देवगण शिवजी के शरण में अपनी मुश्किलों के हल के लिए पहुंचे| उस समय भगवान शिवजी के दोनों पुत्र वहाँ पर उनके साथ गणेश और कार्तिकेय भी वहीं बैठे थे| वहाँ वह दोनों भाई अपने सामने हुई बातों को ध्यान से सुन रहे थे.

देवताओं की मुश्किल को देखकर शिवजी नें गणेश और कार्तिकेय से प्रश्न पूछा – तुममें से कौन देवताओं की मुश्किलों को हल करेगा और उनकी मदद करेगा|

जब दोनों भाई मदद करने के लिए तैयार हो गए तो शिवजी नें उनके सामने एक प्रतियोगिता रखी.

इस प्रतियोगिता के अनुसार दोनों भाइयों में जो भी सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटेगा वही देवताओं की मुश्किलों में मदद करेगा.

जैसे ही शिवजी नें यह बात कही – कार्तिकेय अपनी सवारी मोर पर बैठ कर पृथ्वी की परिक्रमा करने चले गए| परन्तु गणेश जी वही अपनी जगह पर खड़े रहे और सोचने लगे की वह मूषक की मदद से पूरी पृथ्वी का चक्कर कैसे लगा सकते हैं?

उसी समय उनके (गणेश) मन में एक उपाय आया, और वे अपने पिता शिवजी और माता पार्वती के पास गए और उनकी सात बार परिक्रमा करके वापस अपनी जगह पर आकर खड़े हो गए.

कुछ समय बाद कार्तिकेय पृथ्वी का पूरा चक्कर लगा कर वापस पहुंचे और स्वयं को विजेता कहने लगे| तभी शिवजी नें गणेश जी की ओर देखा और उनसे प्रश्न किया – क्यों गणेश तुम क्यों पृथ्वी की परिक्रमा करने नहीं गए?

तभी गणेश जी ने उत्तर दिया – “माता पिता में ही तो पूरा संसार बसा है?” चाहे में पृथ्वी की परिक्रमा करूँ या अपने माता पिता की एक ही बात है.

यह सुन कर शिवजी बहुत खुश हुए और उन्होंने गणेश जी को सभी देवताओं के मुश्किलों को दूर करने की आज्ञा दी| साथ ही शिवजी नें गणेश जी को यह भी आशीर्वाद दिया कि कृष्ण पक्ष के चतुर्थी में जो भी व्यक्ति तुम्हारी पूजा और व्रत करेगा उसके सभी दुःख दूर होंगे और भौतिक सुखों की प्राप्ति होगी.

वेदव्यास और गणेश जी की कहानी – Story Of Lord Ganesh in Hindi

Best Lord Ganesha Story in Hindi

गणेश जी और वेदव्यास एक साथ महाभारत लिखते हुये – बहुत ही अच्छी कहानी है, थोड़ा ध्यान से पढ़िएगा.

जब महर्षि वेदव्यास महाभारत लिखने के लिए बैठे, तो उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो उनके मुख से निकले हुए महाभारत की कहानी को लिखे| इस कार्य के लिए उन्होंने श्री गणेश जी को चुना.

गणेश जी भी इस बात के लिए मान गए पर उनकी एक शर्त थी कि पूरा महाभारत लेखन को एक पल के लिए भी बिना रुके पूरा करना होगा.

गणेश जी बोले » अगर आप एक बार भी रुकेंगे तो मैं लिखना बंद कर दूंगा|

महर्षि वेदव्यास नें गणेश जी की इस शर्त को मान लिया| लेकिन वेदव्यास ने गणेश जी के सामने भी एक शर्त रखा और कहा – गणेश आप जो भी लिखोगे समझकर ही लिखोगे| गणेश जी भी उनकी शर्त मान गए| दोनों महाभारत के महाकाव्य को लिखने के लिए बैठ गए.

वेदव्यास जी महाकाव्य को अपने मुहँ से बोलने लगे और गणेश जी समझ-समझ कर जल्दी-जल्दी लिखने लगे.

कुछ देर लिखने के बाद अचानक से गणेश जी का कलम टूट गया| कलम महर्षि के बोलने की तेजी को संभाल ना सका|

गणेश जी समझ गए की उन्हें थोडा सा गर्व हो गया था और उन्होंने महर्षि के शक्ति और ज्ञान को ना समझा| उसके बाद उन्होंने धीरे से अपने एक दांत को तोड़ दिया और स्याही में डूबाकर दोबारा महाभारत की कथा लिखने लगे.

जब भी वेदव्यास को थकान महसूस होता वे एक मुश्किल सा छंद बोलते, जिसको समझने और लिखने के लिए गणेश जी को ज्यादा समय लग जाता था और महर्षि को आराम करने का समय भी मिल जाता था.

महर्षि वेदव्यास जी और गणेश जी को महाभारत लिखने में 3 वर्ष लग गए.

वैसे तो कहा जाता है की महाभारत के कुछ छंद घूम हो गए हैं परन्तु आज भी इस कविता में 100000 छंद हैं.

क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि गणेश जी का एक दाँत थोड़ा सा टूटा हुआ है, और उसके पीछे की वजह थी ये| मुझे भी इस लेख को लिखने से पहले ज्ञात नहीं था|


बुढ़िया की चतुराई देखकर गणेश जी भी प्रसन्न हो गए | Ganesh Ji Ki Katha

एक छोटे से गांव में एक गरीब बुढ़िया रहती थी वह बुढ़िया दृष्टिहीन थी! वह दिन रात गणेश जी की पूजा किया करती थी। बुढ़िया की भक्ति से प्रसन्न होकर एक बार गणेश जी उसके सामने प्रकट हुए और कहने लगे – “बूढ़ी मां आप जो चाहे वह मांग लीजिए!”

👉 तो बुढ़िया ने कहा- “मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा कि मैं क्या मांगू!”

» अब गणेश जी कहते हैं कि अपने बेटे या बहू से पूछ कर मांग लो!

👉 बेटे से पूछने पर वह कहता है कि तुम धन मांग लो और बहू से पूछने पर वह कहती है कि तुम नाती मांग लो। जब बुढ़िया पड़ोसियों से पूछती है तो वह कहते हैं कि तुम्हारी बस थोड़ी सी ही उम्र बची है। इस उम्र में तुम अब धनराशि का क्या करोगी तो तुम अपनी आंखों की रोशनी मांग लो।

इन सभी की बातों को सुनने के बाद बुढ़िया गणेश जी को कहती हैं कि आप मुझे नौ करोड़ की माया दे दीजिए, निरोगी काया दे दीजिए, आंखों की रोशनी दे दीजिए, नाती दे दीजिए, पोता दे दीजिए, अमर सुहाग दे दीजिए, और सब परिवार को सुख दें और अंत में मोक्ष दे दीजिए!

बुढ़िया की बात सुनकर गणेश जी भी हैरान रह जाते हैं और फिर वादा अनुसार उसे हर वह चीज दे देते हैं और वहां से गायब हो जाते हैं।


भगवान गणेश के विवाह की कहानी

भगवान गणेश जी की पूजा देवताओं में सबसे पहले की जाती थी लेकिन बात उस समय की है जब उनका विवाह नहीं हो रहा था क्योंकि कोई भी कन्या उनसे विवाह नहीं करना चाहती थी क्योंकि एक तो गणेश जी का सिर हाथी का सिर था और उनकी एक दांत भी टूटी हुई थी। इसीलिए कोई भी कन्या उनसे विवाह करने के लिए तैयार नहीं हो रही थी।

विवाह ना हो पाने के कारण गणेश जी दुखी रहने लगे थे। जब गणेश जी अन्य देवी देवताओं के विवाह में जाते थे तो उन्हें अपने विवाह की याद आ जाती। दूसरे देवी देवताओं का विवाह होते देख कर गणेश जी इतने ज्यादा दुखी हो गए थे कि उन्होंने दूसरे देवी-देवताओं के विवाह में अड़चन लाना शुरू कर दिया था और उनके इस काम में उनका वाहन मूषक उनकी मदद करता था। गणेश जी के आदेश पर उनका मूषक देवी देवताओं के विवाह में जाता और उनके मंडप को खराब कर देता था जिससे विवाह में विघ्न आ जाता था।

गणेश जी और मूषक की इन शैतानियों से सभी देवी-देवता परेशान हो गए थे इसलिए सभी ने महादेव यानी की गणेश जी की पिता के पास उनकी शिकायत के लिए गए। लेकिन शिवजी के पास भी इस समस्या का कोई समाधान नहीं था इसलिए वह देवताओं की कोई मदद नहीं कर पाए। लेकिन भगवान शिवजी और माता पार्वती ने‌ देवताओं को इतना कहा कि इस परेशानी का हल केवल ब्रह्मा जी ही निकाल सकते हैं।

महादेव और माता पार्वती की बात सुनकर सारे देवी देवता ब्रह्मा जी के पास चले गए इस समय ब्रह्म जी योगनिद्रा में लीन थे। ब्रह्मा जी को योग में देखकर देवी देवता उनसे प्रार्थना करने लगे जिसके फलस्वरूप ब्रह्मा जी के योग से रिद्धि सिद्धि नाम की दो पुत्री प्रकट हुई। क्योंकि रिद्धि सिद्धि ब्रह्मा जी के योग से उत्पन्न हुई थी इसीलिए रिद्धि सिद्धि को ब्रह्मा जी की मानस पुत्री कहा जाता है।

पुत्रियों को प्राप्त करने के बाद ब्रह्मा जी अपनी दोनों पुत्रियों रिद्धि और सिद्धि को लेकर गणेश जी के पास पहुंचे और गणेश जी को उन्हें शिक्षा देने के लिए कहने लगे क्योंकि गणेश जी बहुत ही बुद्धिमान और ज्ञानी थे। ‌ब्रह्मा जी के कहने पर भगवान गणेश रिद्धि सिद्धि को शिक्षा देने के लिए तैयार हो गए।

रिद्धि सिद्धि की शिक्षा शुरू हो गई थी इस बीच जब भी उनका बदमाश मूषक किसी देवी देवता के विवाह में अड़चन डालने के लिए गणेश जी को उनके विवाह के बारे में बताने के लिए आता तो रिद्धि सिद्धि स्वांग रच कर हमेशा मूषक को भगा देती थी। जिससे देवी देवताओं का विवाह बिना किसी विघ्न के पूरा हो जाता था।

ऐसे करते-करते काफी समय बीत गया। एक दिन गणेश जी को पता चल गया कि रिद्धि सिद्धि के कारण ही देवी देवताओं का विवाह बिना किसी अड़चन के पूरा हो रहा है। इस बात का पता लग जाने पर गणेश जी काफी ज्यादा क्रोधित होते हैं लेकिन गणेश जी क्रोध कर पाते इससे पहले ही ब्रह्म जी वहां प्रकट हो जाते हैं और गणेश जी से कहते हैं कि गणेश जी मेरे दोनों पुत्री रिद्धि सिद्धि के लिए मुझे कोई योग्य वर नहीं मिल रहा है! इसीलिए मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि आप ही मेरी दोनों पुत्री से विवाह कर ले।

ब्रह्मा जी के कहने पर गणेश जी रिद्धि सिद्धि से विवाह करने के लिए मान जाते हैं और उनका बड़े ही धूमधाम से विवाह होता हैं। ऐसी माना जाता है है कि गणेश जी के रिद्धि सिद्धि से 2 पुत्र हुए जिनका नाम शुभ और लाभ है।

श्री गणेश जी की कहानी | Ganesh Ji Ki Kahani | Ganesh Ji Ki Katha पढ़कर आपको कैसा लगा कमेंट करके जरूर बताइएगा, यह लेख यहीं पर समाप्त हो रहा है।

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