Advertisement
Advertisement

सम्पूर्ण महाभारत भाग 1 – Mahabharat Katha Part 1

Advertisement

परिचय ⇒ महाभारत हिन्दुओ का एक महान ग्रन्थ है| यह एक सबसे महान काव्य है इसे केवल भारत भी कहा जाता है यह विश्व का सबसे लम्बा ग्रन्थ है इसके मुख पात्र भगवान श्री कृष्ण, युधिष्ठिर अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव और दुर्योधन है| महाभारत की पूरी कहानी के रचनाकार वेदव्यास जी को माना जाता है.

वेदव्यास जी को महाभारत लिखने में पूरे तीन वर्ष लगे थे यह ग्रन्थ अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतिक है|

वेदव्यास जी ने मन ही मन में मनन करके योग में स्थित होकर महाभारत की सम्पूर्ण घटनाओं का ज्ञान कर लिया था लेकिन इसके बाद उनके पास एक समस्या आ खड़ी हो गयी थी की वो कैसे काव्य के ज्ञान को साधारण जन तक पहुचाये क्यूंकि यह बहुत जटिल और बहुत लम्बा था तो इसके लिए उनको किसी व्यक्ति की जरूरत पड़ी जो की बिना गलती के वेदव्यास जी को सुनकर लिखता चला जाए.

Advertisement

वेदव्यास जी ब्रह्मा जी के कहने पर भगवान गणेश जी के पास गये और गणेश जी मान गये परन्तु गणेश जी ने यह शर्त रखी की अगर वो एक बार कलम उठा लेंगे तो फिर जब तक काव्य पूर्ण नही होगा तब तक वो कलम नीचे नही रखेंगे.

वेदव्यास जी ने थोड़ी चालाकी दिखाई उन्होंने भी गणेश जी से शर्त रखी की जब वे कोई भी शलोक बोलेंगे तो गणेश जी को उस पर विचार करना होगा तो जब गणेश जी श्लोक पर विचार करते थे तब वेदव्यास जी और शोलोक सोच लेते थे|

परिणाम यह निकला की वेदव्यास जी ने सर्वप्रथम मनवो के उपाख्यानो सहित एक लाख श्लोकों का आदी भारत ग्रंथ बनाया|

परन्तु उपाख्यानो को छोडकर चोबीस हजार श्लोकों की भारत सहिंता बनाई इसके बाद वेदव्यास जी ने 60 लाख श्लोकों की भारत सहिंता बनाई जिसके तीस लाख शलोक देवलोक में, प्रन्द्रह लाख शलोक पितृ लोक में तथा चोदह लाख शलोक गन्धर्व लोक में समाद्रित हुए.

महाभारत में अठारह पर्व है और सों उपप्रव है| आपको मैंने महाभारत का संक्षिप्त परिचय तो दे दिया है अब इस महान काव्य का ज्ञान करने की और चलते है.

महाभारत भाग 1 – कुरु वंश की उत्पत्ति का इतिहास

Full Mahabharat Story in Hindi
Image Source : Wikipedia

पुराणों के अनुसार ब्रह्मा जी से अग्नि और अग्नि से चंद्रमा, चंद्रमा से बुध और बुध से इलानंदन पुरुरवा का जन्म हुआ| पुरुरवा से आयु, आयु से राजा नहुष और नहुष से ययाति उत्पन्न हुए| ययाति से पुरु हुए पुरु के वंश में भरत और भरत के कुल में राजा कुरु हुए.

कुरु वंश में शांतनु का जन्म हुआ| शांतनु का विवाह माता गंगा से हुआ था जब शांतनु से गंगा का विवाह हुआ था तब गंगा ने उनसे एक वचन लिया था की वह कोई भी कार्य करे शांतनु उनसे कुछ नही पूछेंगे तब शांतनु ने गंगा को वचन दिया की वह उससे कभी कोई प्रश्न नही करेंगे और न ही किसी भी कार्य का कारण जानेंगे.

गंगा के आठ पुत्र हुए जिसमे से सात को वह अपने जल में गंगा में बहा चुकी थी और जब वह आठवे पुत्र को बहाने जा रही थी तब शांतनु ने उसे रोक लिया और वह आठवे पुत्र को जीवित देने का वचन देकर चली गयी.

जब वह पुत्र बड़ा हुआ तब वह उसे शांतनु को वापस देने के लिए आई और राजा शांतनु ने उसे सम्मान से अपना पुत्र स्वीकार किया उसका नाम देवव्रत था| इसके बाद राजा शांतनु ने सत्यवती से विवाह किया| सत्यवती के गर्भ से दो पुत्र हुए चित्रांगद और विचित्रवीर्य.

जब राजा शांतनु सत्यवती से विवाह करने वाले थे तब सत्यवती के पिता ने उन्हें कहा था की मेरी पुत्री का जो भी पुत्र होगा वही आगे चलकर राजा बनेगा तब राजा शांतनु ने विवाह करने से इनकार कर दिया था फिर देवव्रत ने अपने पिता का विवाह कराने का निर्णय लिया.

गंगा पुत्र देवव्रत ने यह प्रतिज्ञा ली की वे अपने होने वाले छोटे भाई को अपना अधिकार दे देंगे और उसे राज्य शाशन करने देंगे| उन्होंने आजीवन ब्रह्म्चर्य होने का निर्णय लिया.

जब महाराज शांतनु को यह बात पता चली की देव व्रत ने एसी प्रतिज्ञा ले ली है तो उन्होंने उसे ‘भीष्म’ नाम दिया| देवव्रत के भीष्म प्रतिज्ञा लेने की वजह से उनका नाम सदेव के लिए भीष्म पड़ गया उसी दिन से समस्त विश्व उनको गंगा पुत्र भीष्म कहकर बुलाने लगा और राजा शांतनु ने भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान दिया.

एक बार हस्तिनापुर के नरेश दुष्यंत वन में गये जिस वन में दुष्यंत शिकार के लिए गये थे उसी वन में एक आश्रम था वह आश्रम कण्व ऋषि का था| यह बात जानकर ऋषि के दर्शन हेतु दुष्यंत उनके आश्रम में पहुच गये|

जब उन्होंने कण्व ऋषि को पुकार लगाई तो एक बहुत सुंदर कन्या उनके आश्रम से निकल कर बाहर आई और वह बोली “हे राजन महर्षि तो तीर्थ यात्रा पर गये है परन्तु आपका इस आश्रम में स्वागत है”.

उस कन्या को देख कर दुष्यंत चकित रह गये और पूछने लगे आप कोन है महर्षि तो ब्रह्म्चर्य है तो कन्या बोली मेरा नाम शकुन्तला है मेरे माता पिता मेनका और विश्वामित्र है लेकिन वो मुझे वन में छोड़ गये थे| उसके बाद शकुन्त नामक पक्षी ने मेरा पालन किया और इसीलिए मेरा नाम शकुन्तला पड गया.

इसके बाद कण्व ऋषि की नजर मुझ पर पड़ गयी और वो मुझे अपने साथ ले आये| उन्होंने ही मेरा पालन पोषण भरण सब किया उन्होंने पिता की तरह मेरा पालन किया इसीलिए वो मेरे पिता है.

शकुन्तला की बातो को जानकर महाराज दुष्यंत बोले की तुम शत्रिय कन्या हो मै तुमसे विवाह करना चाहता हूँ और शकुन्तला को महाराज प्रिय भी लगने लगे थे वह विवाह के लिए मान गयी दोनों ने एक दुसरे से विवाह कर लिया.

कुछ काल तक महाराज शकुन्तला के साथ वन में ही रहे फिर एक दिन वो शकुन्तला से बोले प्रिय मुझे अपना राज्य भी संभालना है इसीलिए मुझे अपने राज्य की और प्रस्थान करना होगा जब ऋषि आ जायेंगे तब मै उनकी अनुमति से तुम्हे अपने महल ले चलूँगा|

ऐसा कह कर महाराज अपने प्रेम के प्रतीक के रूप में शकुन्तला को स्वर्ण मुद्रा देकर चले गये|

कुछ समय बाद आश्रम में ऋषि दुर्वासा आये और महाराज दुष्ययंत के विरह में लींन होने के कारण शकुन्तला को उनके आगमन का ज्ञान नही हुआ और ऋषि दुर्वासा ने इसे अपना अपमान समझा और उन्हें गुस्सा आ गया और उन्होंने शकुन्तला को शाप दे दिया की जिसके ध्यान में लीं होकर तूने मेरा अपमान किया है वह तुझे भूल जायेगा.

इस बात को सुनकर शकुन्तला होश में आ गयी और वह ऋषि से शमा याचना करने लगी तब उसे ऋषि ने शमा करते हुए कहा की अगर तेरे पास उसकी कोई प्रेम की निशानी है तो वह देखकर वह तुझे याद कर लेगा इसके बाद जब ऋषि कण्व वापस आये और शकुन्तला ने उनको सारी बात बताई तो उन्होंने कहा की पुत्री अब तुम विवाहित हो तुम्हारा अपने पती के घर जाना उचित है.

ऋषि कण्व ने अपने चार दासो के साथ अपनी पुत्री को राजा के महल भिजवा दिया लेकिन जब वह राजा के महल जा रही तब रास्ते में उसके प्रेम की निशानी दुष्यंत द्वारा दी हुई वह सोने की अंगूठी उससे एक सरोवर में गिर गयी और वह अंगूठी एक मछली खा गयी.

जब वह महल पहुची और ऋषि के दासो ने कहा महाराज शकुन्तला आपकी पत्नी है आप इन्हें स्वीकार करे तब महाराज ने उसके चरित्र पर ऊँगली उठाकर उन्हें अपमानित कर दिया जिसके बाद आकाश में जोर जोर से बिजली कडकी और शकुन्तला की माता मेनका आई और अपनी पुत्री को उठा कर ले गयी.

जिस मछली ने शकुन्तला की अंगूठी को निगल लिया था उससे एक मछुआरे ने पकड़ लिया और मछुआरे ने मछली को काटा तो उसमे से वह सोने की अंगूठी निकली उसने उस अंगूठी को राजा को उपहार में देने की सोची|

राजा ने वह अंगूठी देखी उनको सब कुछ याद आ गया और वो शकुन्तला की खोज में निकल पड़े उन्होंने हर जगह शकुन्तला का पता करवाया लेकिन उन्हें कुछ पता नही चला|

कुछ दिनों बाद महाराज देव इंद्र ने महाराज दुष्यंत को निमंत्रण दिया| जब वह वेद इंद्र के यहा से वापस आ रहे थे तब आकाश मार्ग से आते हुए उनकी नजर कश्यप ऋषि के आश्रम पर पड़ी वो उनके दर्शन के लिए वह चल पड़े|

वहा उन्होंने देखा की एक बहुत मनोहर बालक भयानक सिंह से खेल रहा है वह बालक शकुन्तला का था|

जब महाराज शकुन्तला पुत्र के निकट जा रहे थे तब उन्हें जाते हुए शकुन्तला की सखी ने देख लिया और वह चिल्ला कर बोली की महाराज आप भस्म हो जायेंगे अगर आप उस बालक को हाथ लगाएंगे तो लेकिन महाराज का ध्यान तो बालक की और था और वे उसे गोद में उठा कर खिलाने लगे.

जब उस स्त्री ने देखा की बालक के हाथ से बंधा हुआ काला धागा छुट कर नीचे गिर गया वह समझ गयी वे उसके पिता है| उस स्त्री ने सारी बात शकुन्तला को बताई और जब शकुन्तला आई तो महाराज धुश्यंत ने उन्हें पहचान लिया और वे उन्हें और अपने पुत्र को अपने साथ महल ले गये.

शकुन्तला के पुत्र का नाम भरत था और यह आगे चलकर महान प्रतापी सम्राट बना| हमारे देश का नाम भारतवर्ष भरत के नाम पर ही भारत बना|

कृपाचार्य और द्रोणाचार्य – Mahabharat Story in Hindi

महाभारत कथा हिंदी में भाग 1
गुरु द्रोणाचार्य

महाभारत : ऋषि गोतम के पुत्र का नाम श्रदां था| उनका जन्म बानो के साथ हुआ था उन्हें वेदाभ्यास में जरा सी भी रूचि नही थी और धनुर्विद्या से बहुत अधिक लगाव था वे धनुर्विद्या में इतने निपुण हो चुके थे की देवराज इंद्र भी उनसे भयभीत होकर रहने लगे थे.

इंद्र ने उनकी साधना भंग करने के लिए उनके पास एक देव कन्या को भेजा उस देव कन्या के प्रभाव से कृप नामक बालक पैदा हुआ और दुसरे भाग से कृपी नामक कन्या पैदा हुई.

कृप भी अपने पिता के समान धनुर्विद्या में बहुत निपुण साबित हुए| भीष्म जी ने क्र्प जी को ही पांडवों और कौरवों की शिक्षा के लिए नियुक्त किया.

गुरु द्रोण के साथ पर्षद नामक राजा के पुत्र द्रुपद भी शिक्षा प्राप्त कर रहे थे| ठाठ दोनों में प्रगाढ़ मंत्री हो गयी ठाठ उन्ही दिनों परशुराम अपनी समस्त सम्पत्ति को दान करके महेंद्र पर्वत पर तप कर रहे थे.

एक बार द्रोण उनके पास पहुचे और उनसे दान देने का अनुरोध किया तब परशुराम बोले की वत्स तुम अब आये हो परन्तु तुम्हारे आने से पहले ही मै अपना सब कुछ दान कर चूका हूँ अब तो केवल मेरे पास अस्त्र शस्त्र बचे है तुम चाहो तो इनको ले सकते हो और यही गुरु द्रोणाचार्य चाहते थे|

उन्होंने भगवान परशुराम जी को बोला आपके अस्त्र शस्त्र पाकर मुझे बड़ी प्रसन्ता मिलेगी परन्तु आपको मुझे इन अस्त्र शस्त्र की शिक्षा भी देनी होगी तब परशुराम जी ने गुरु द्रोणाचार्य को अपना शिष्य मानकर अस्त्र शस्त्र का ज्ञान भी दिया.

शिक्षा प्राप्त करने के बाद गुरु द्रोणाचार्य का विवाह हो गया उनका विवाह कृपाचार्य की बहन कृपी से हुआ| गुरु द्रोणाचार्य और कृपी का एक पुत्र हुआ जब वह पुत्र हुआ था तो उसके मुख से अश्व की भाति ध्वनी निकली थी इसी कारण उस पुत्र का नाम अश्वत्थामा रखा गया.

राजाश्रय प्राप्त ना होने के कारण द्रोण अपने परिवार के साथ निर्धनता में समय व्यतीत कर रहे थे| एक दिन अश्वत्थामा दूध पिने के लिए मचल उठा और वह जिद करने लगा तब गुरु द्रोण को अपना बचपन का दोस्त द्रुपद का स्मरण हुआ और वे उनके पास जाने लगे.

द्रुपद नरेश बन चुके थे तो उनमे अहंकार की भावना आ गयी थी| जब द्रोण ने द्रुपद से मिलकर कहा मै तुम्हारा बचपन का मित्र हूँ तुम मेरी मदद करो मुझे एक गाय दे दो तब द्रुपद ने उन्हें अपमानित करते हुए कहा की तुम्हे खुद अपने आपको मेरा मित्र बताते हुए लज्जा नही आ रही क्या और उन्हें अपमानित कर दिया.

गुरु द्रोण वहा से चुप चाप वापस चले गये और वे कृपाचार्य के घर में गुप्त से रहने लगे| एक दिन युधिष्ठिर और सभी राजकुमार से गेंद से खेल रहे थे और गेंद कुए में जाकर गिर गयी और वही से गुरु द्रोण जा रहे थे तब युधिष्ठिर बोले की आप हमारी गेंद निकाल दे तब गुरु द्रोण बोले अगर हम आपकी गेंद निकाल देंगे तो आप मेरे लिए भोजन देंगे ?

युधिष्ठिर बोले अगर हमारे पितामह की अनुमति हुई तो आप हमेशा के लिए भोजन पा सकेंगे| ये जानकर गुरु द्रोण ने गेंद निकाल दी और भीष्म ने राजकुमारों की शिक्षा के लिए गुरु द्रोण को वही रख लिया.

धृतराष्ट्र पाण्डु और विदुर का जन्म और उनके विवाह

महाभारत : सत्यवती के दो पुत्र हुए थे एक चित्रांगद और दूसरा विचित्रवीर्य|

जब ये दोनों राजकुमार छोटे ही थे तब इनके पिता राजा शांतनु की मृत्यु हुई थी इसीलिए राजकुमारों का पालन पोषण भीष्म ने किया|

जब कुमार चित्रांगद बड़े हुए तब भीष्म ने इनको राज गद्दी पर बिठा दिया लेकिन कुछ काल बाद चित्रांगद मारा गया इसके बाद भीष्म ने विचित्रवीर्य को राज्य सोप दिया|

अब विचित्रवीर्य विवाह योग्य हो गये थे इसीलिए भीष्म ने उनके विवाह के बारे में विचार किया तथा उन दिनों की काशिराज की तीन पुत्रियों का स्वयंवर होने वाला था| इन तीनो के नाम अम्बा, अम्बालिका, अम्बिका था|

उनके स्वयंवर में जाकर भीष्म ने सभी राजाओ को हराकर तीनो कन्याओं को अपने साथ ले आये तथा जब वे तीनो को अपने साथ अपने महल लाये तो राजकुमारी अम्बा बोली की वो राजा शाल्व को पसंद करती है तब भीष्म ने अम्बा को सम्मान के साथ राजा शाल्व के पास भेज दिया लेकिन राजा शाल्व ने उन्हें अब स्वीकार नही किया|

अब अम्बा वापस हस्तिनापुर आ गयी और उन्होंने भीष्म से बोला की महाराज उन्होंने मुझे स्वीकार नही किया है कृप्या अब आप मुझसे विवाह करे किन्तु भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा के कारण अम्बा को स्वीकार नही किया जिससे की अम्बा स्वम् का अपमान सहकर वहा से चली गयी.

राजा विचित्रवीर्य अपनी दोनों पत्नियों के साथ भोग विलास मे लीन थे और कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हो गयी थी और उनकी दोनों ही रानियों से कोई सन्तान नही हुई थी.

अब कोई सन्तान न होने की वजह से माता सत्यवती को कुल के नाश होने का भय सताने लगा तो माता सत्यवती ने भीष्म को दोनों रानियों से पुत्र देने की आगया दी परन्तु भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा नही तोडी|

अब माता सत्यवती दुःख के साथ समय व्यतीत कर रही थी और अचानक उनको अपने पुत्र वेदव्यास का स्मरण आया|

जैसे ही माता ने वेदव्यास का स्मरण किया तभी उनके पुत्र वेदव्यास वहां उपस्थित हो गये और वो उनसे बोली “पुत्र तुम्हारे भाई बिना किसी सन्तान के स्वर्गवासी हो गये अब तुम ही इस वंश का नाश होने से बचा सकते हो मै तुम्हे आज्ञा देती हूँ की तुम इन पत्नियों से सन्तान उत्पन्न करो”

अब व्यास बोले की माता मै एक वर्ष बाद आऊंगा माता बोली की एक वर्ष का समय ही है पुत्र तब वेदव्यास जी ने अम्बिका को बुलाया और अम्बिका उनको देख कर डर गयी और उसने आखे बंद कर ली जिससे की निष्कर्ष यह निकला की वेदव्यास ने माता सत्यवती को बताया की माता अम्बिका का पुत्र होगा तो बड़ा तेजवान लेकिन वह आख से नेत्रहीन होगा|

माता सत्यवती को यह जानकर बड़ा दुःख हुआ और फिर वेदव्यास जी अम्बालिका को अपने पास बुलाये और अम्बालिका उन्हें देख कर भय से पिली पड गयी और इसका निष्कर्ष यह निकला की उसका पुत्र रोग से ग्रसित रहेगा|

अब माता सत्यवती को और भी दुःख हुआ और माता सत्यवती ने अम्बालिका को पुनह वेदव्यास के पास जाने का आदेश दिया लेकिन अम्बालिका ने खुद न जाकर दासी को वेदव्यास के पास भेज दिया और दासी के गर्भ से अत्यंत तेजवान पुत्र उत्पन्न होगा इतना कह कर वेदव्यास फिर से तपस्या करने चले गये.

समय आने पर अम्बिका के गर्भ से धृतराष्ट्र, अम्बालिका के गर्भ से पाण्डु और और दासी के गर्भ से विदुर हुए.

पाण्डु का राज्याभिषेक – महाभारत कथा हिंदी में भाग 1

धृतराष्ट्र जन्म से ही अंधे होने के कारण उनकी जगह पाण्डु को राजा बनाया गया इसी वजह से ध्रिष्ट्र को अपने नेत्रहीन होने पर सदेव खुद और क्रोध आता था.

अब उन्हें पाण्डु से द्वेष भावना भी होने लगी थी| पाण्डु समस्त भारतवर्ष को जीत कर कुरु राज्य सीमाओं का यवनों के देश तक विस्तार कर दिया था.

एक बार राजा पाण्डु अपनी दोनों पत्नियों कुंती और माद्री के साथ शिकार करने वन में गये वहा उनको मर्ग का जोड़ा दिखाई दिया और पाण्डु ने तुरंत ही उस मर्ग को अपने बानो से घायल कर दिया|

मरते हुए उस निर्दोष मर्ग ने पाण्डु को श्राप दे दिया की तुम्हारे समान और कोई इस संसार में क्रूर नही होगा| तूने मुझे प्रणय के समय मारा जब भी कभी तू प्रणयरत होगा तो तेरी भी मृत्यु हो जाएगी.

अब इस शाप से पाण्डु बहुत दुखी हो गया और वह अपनी रानियों से बोला की आप दोनों वापस महल चली जाइए मै अपना जीवन यही व्यतीत करूंगा तो उनकी पत्नियाँ बोली की “हे महाराज हम आपके बिना नही रह सकती हम यही आपके साथ ही रहेंगी”.

पाण्डु ने अपनी दोनो रानियों को अपने साथ वन में ही रख लिया तथा पाण्डु ने उसी दोरान कुछ ऋषि मुनियों को ब्रह्मा जी के दर्शन के लिए जाते हुए देखा| उन्होंने आग्रह किया की मुझे भी अपने साथ ले चले.

निसंतान पुरुष ब्रह्मलोक जा नही सकता| यह बात सुनकर पाण्डु अपनी पत्नी से बोले कुंती मेरा जन्म लेना ही व्यर्थ है क्यूंकि संतानहीन व्यक्ति पितृ ऋण, देव ऋण और मनुष्य ऋण से मुक्ति नही पा सकता क्या तुम पुत्र प्राप्ति के लिए मेरी सहयता कर सकती हो ?

पाण्डु की पत्नी कुंती पाण्डु से बोलती है की “हे आर्य, ऋषि दुर्वासा ने मुझे ऐसा मन्त्र दिया है जिसे जपकर मै किसी भी देवता को बुला सकती हूँ और मनचाहा फल मांग सकती हूँ”.

कुंती बोली आप आज्ञा दे मै किस देव को बुलाऊ ?

पांडू ने कुंती को धर्म को बुलाने का आदेश दिया

धर्म ने कुंती को पुत्र प्रदान किया जिसका नाम युधिष्ठिर रखा गया| कालान्तर में पाण्डु ने कुंती को पुन: दो बार वायुदेव और इन्द्रदेव को बुलाने की आज्ञा दी|

वायुदेव से भीम और इंद्र देव से अर्जुन की उत्पत्ति हुई इसके बाद पाण्डु की आज्ञा से कुंती ने माद्री को भी इस मन्त्र की शिक्षा दी|

माद्री ने अश्वनी कुमारो को जन्म दिया और उनसे नकुल और सहदेव की उत्पत्ति हुई|

एक दिन राजा पाण्डु माद्री के साथ वन में सरिता के तट पर भ्रमण कर रहे थे और उसी समय माद्री का वस्त्र हवा के झोके के कारण उड़ गया पाण्डु का मन चंचल हो उठा और वे प्रणय में परवर्त हुए ही थे तभी उनकी मृत्यु हो गयी| माद्री भी उनके साथ सती हो गयी.

कुंती सभी बालको को लेकर हस्तिनापुर लोट आई और ऋषि मुनि पांडवों को राजमहल छोडकर आगये| कुंती ने जब सबको बताया की ये पाण्डु पुत्र है तो सभी ने पाण्डु पुत्रों का स्वागत किया.

कर्ण का जन्म कैसे हुआ महाभारत में – Mahabharata Karna Story in Hindi

भीष्म पर धृतराष्ट्र ,पाण्डु और विदुर तीनो के लालन पालन का भार था| तीनो पुत्र बड़े होने के बाद विद्या के लिए भेजे गये धृतराष्ट्र बल विद्या में पाण्डु धनुर्विद्या में और विदुर धर्म और निति में निपुण हुए.

अंधे होने की वजह से धृतराष्ट्र को उतराधिकारी का पद नही मिला| विदुर तो दासी पुत्र थे इसीलिए पाण्डु को ही हस्तिनापुर का राजा घोषित किया गया.

भीष्म ने धृतराष्ट्र का विवाह गांधार की राजकुमारी गांधारी से करा दिया| जब गांधारी को ज्ञात हुआ की उनका पती अँधा है तो उसने भी अपनी आखो पर पट्टी बाध ली|

राजा शूरसेन की पुत्री को की बाद में पाण्डु की पत्नी बनने वाली थी जब वह कुवारी थी| उनके यहा ऋषि दुर्वासा का आगमन हुआ और कुंती ने दिल लगाकर ऋषि दुर्वासा की सेवा की और कुंती की इस बात से ऋषि दुर्वासा बहुत अधिक प्रसन्न हुए और उन्होंने कुंती को एक ऐसा मन्त्र दिया जिसका जप करके वह किसी भी देवता को बुला सकती थी.

ऋषि दुर्वासा तो मन्त्र का ज्ञान देकर चले गये और कुंती पीछे से परेशान थी की वह केसे जाने की यह मन्त्र कार्य करता है या नही तब वह एकांत में बेठ कर उस मन्त्र का जाप करने लगी और उसने सूर्य देव का आवाहन किया तभी सूर्य देव वहा प्रकट हो गये और बोले की देवी मुझे बताओ की तुम्हे किस वस्तु की अभिलाषा है में तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूंगा|

कुंती बोली देव मुझे आपसे कुछ नही चाइये मै तो केवल मन्त्र की सत्यता परखने के लिए आपका आवाहन कर रही थी| कुंती की यह बात जानकर सूर्यदेव बोले की मेरा आना वर्थ नही जा सकता मै तुमको अत्यंत प्रकर्मी और दानशील पुत्र प्रदान करता हूँ इतना कह कर सूर्यदेव वहा से चले गये.

कुंती को लगा की अभी तो वह विवाहित भी नही है कही कोई उसके चरित्र पर ना दाग लगा दे| समय आने पर कुंती के गर्भ से कवच कुण्डल धारण किये हुए पुत्र पैदा हुआ|

कुंती ने उस बालक को रात्रि में गंगा में बहा दिया| वह बहता हुआ बालक वहा पहुचा जहा धृतराष्ट्र का सारथि अधिरथ अपने अश्व को गंगा नदी में जल पिला रहा था उसकी दृष्टि कवचकुण्डल धारी पुत्र पर पड़ी.

अधिरथ की कोई संतान नही थी उसने बालक को उठाकर सिने से लगा लिया और घर लेजाकर अपने पुत्र की तरह पालने लगा उस बालक के कान बहुत अधिक सुंदर थे इसीलिए उसका नाम कर्ण (सूर्यपुत्र कर्ण) रखा गया.

कर्ण की रूचि युद्धकला में अधिक थी कर्ण और उसके पिता अदीरथ आचार्य द्रोण से मिले जो की युद्धकला में सर्वश्रेष्ट थे|

द्रोणाचार्य सिर्फ स्त्रियों को ही शिक्षा देते थे और कर्ण सारथि पुत्र था इसके बाद कर्ण ने परशुराम से सम्पर्क किया जो की केवल ब्राह्मण को ही शिक्षा देते थे तो कर्ण ने खुदको ब्राह्मण बताकर शिक्षा का आग्रह किया और परशुराम ने कर्ण को अपने ही समान शिक्षा धनु विधियाँ में निपुण किया.

एक बार दोपहर के समय परशुराम कर्ण की जंघा पर सर रखकर सों रहे थे| कर्ण की जांघ पर बिच्छू काट गया| कर्ण की जांघ से बहुत रक्त बह रहा था जब परशुराम जी की निद्रा टूटी तो उन्होंने कहा की इतनी सहनशीलता तो एक शात्रीय में ही हो सकती है तब उन्होंने कर्ण को श्राप दिया की जब भी कर्ण को उनकी दी हुई शिक्षा की जरूरत पड़ेगी उस दिन वह उसके काम नही आएगी.

कर्ण नही जानता था की वह किस वंश से है उसने गुरु परशुराम से कहा की उसकी जगह कोई भी शिष्य होता वह यही करता उसके बाद परशुराम को अपने क्रोधवश शाप देने के बाद ग्लानी हुई तब उन्होंने कर्ण को अपना विजय नामक धनुष दिया और उसे आशीर्वाद दिया.

इसके बाद कुछ समय तक कर्ण भटकता रहा फिर वह शब्दभेदी विद्या सिख रहा था| अभ्यास के बाद उसने एक गाय के बछड़े को वनीय पशु समझ कर उस पर बाण चला दिया और बछडा मारा गया तब उस गाय के स्वामी ने गुस्से में आकर कर्ण को श्राप दे दिया की जिस तरह तुमने एक असहाय जिव को मारा है ठीक इसी तरह तुमारी भी मृत्यु हो जाएगी फिर कर्ण दुर्योधन के आश्रय में रहने लगा.

गुरु द्रोण ने अपने शिष्यों की शिक्षा पूरी होने के बाद एक रंगभूमि का आयोजन करवाया| रंगभूमी में अपने अलग अलग करतबों से एक बेहतरीन योधा साबित हुआ| तब कृपाचार्य ने कर्ण को इस मुकाबले में हिस्सा लेने से मना कर दिया और अर्जुन हस्तिनापुर का राजकुमार था इसीलिए वह मुकाबले में हिस्सा ले सकता था.

कृपाचार्य ने कर्ण से उसके वंश और साम्राज्य के बारे में पूछा तब कौरवों में सबसे ज्येष्ठ दुर्योधन ने कर्ण को अंगराज घोषित कर दिया जिसके कारण अब कर्ण अर्जुन से युद्ध करने के लिए योग्य हो गये थे.

अब इसके बाद कर्ण और दुर्योधन के बिच अच्छी दोस्ती हो गयी| कर्ण शकुनि मामा को बिलकुल भी पसंद नही करता था| कर्ण को पता नही था की वह सूर्य पुत्र और कुंती का पुत्र है इसलिए वह दुर्योधन के साथ दोस्ती निभा कर पांडवों को मारने के प्रयास में मदत कर रहा था.

जब दुर्योधन का पांडवों को मारने का प्रयास असफल हो रहा तो कर्ण ने दुर्योधन को समझाया.

एकलव्य की भक्ति – एकलव्य और गुरु द्रोणाचार्य की कहानी हिंदी में

एकलव्य धनु नामक निषाद का पुत्र था एकलव्य को उसकी सीखी हुई धनुर्विद्या और गुरु भक्ति के लिए जाना जाता है| अपने पिता की मृत्यु के बाद वह श्रंग्बेर राज्य का शाषक बना|

कथा के अनुसार एकलव्य धनुर्विद्या सिखने के लिए गुरु द्रोण के पास गये| गुरु द्रोण ने एकलव्य को अपना शिष्य स्वीकार नही किया और इसके बाद एकलव्य वन में चला गया|

उसने द्रोणाचार्य की एक मूर्ती बनाई और उस मूर्ती को ही गुरु मानकर वो अभ्यास करने लगा| एक दिन पांडव और कोरव राजकुमार वन में शिकार करने के लिए गये और उनका कुत्ता वन में भटक गया और वह एकलव्य के आश्रम में पहुच गया और वह एकलव्य को देखकर भोकने लगा|

कुत्ते के भोकने से एकलव्य की साधना में बाधा आ रही थी और एकलव्य ने अपने बानो से कुत्ते का मुह बंद कर दिया| एकलव्य ने इस प्रकार बाण चलाये थे की कुत्ते को किसी भी प्रकार की चोट नही लगी.

कुत्ते के वापस लोटने पर पांडव, कोरव और खुद गुरु द्रोण भी हेरान हो गये थे| गुरु द्रोण एकलव्य की खोज करते हुए वन में जा पहुचे| जब उन्होंने देखा की एकलव्य ने उनकी मूर्ति को ही गुरु मानकर खुद से ही विद्या सीखी है तब गुरु द्रोण ने एकलव्य से गुरु दक्षिणा के रूप में उसका अंगूठा मांग लिया था|

तभी एकलव्य ने अपना अंगूठा काटकर दे दिया था| इसके बाद भी एकलव्य तीर चलाना से नही रुका वह माध्यम ऊँगली और तर्जनी ऊँगली से तीर चलाने लगा और यही से तीर चलाने के नये अंदाज ने जन्म लिया| आज जो आधुनिक तरीका प्रयोग में लाया जाता है वह तरीका एकलव्य से शुरू हुआ था.

लाक्षागृह षड्यंत्र महाभारत | लाक्षागृह की कहानी | Mahabharat Katha in Hindi Part 1

दुर्योधन और शकुनि ने पन्द्वोप के वर में ऐसा कार्य किया जिससे की उनमे जंग की आग प्रज्वलित हो उठी| शकुनि के कहने पर कई बार बचपन में दुर्योधन ने पांडवों को मारने की कोशिश की|

युवा अवस्था में आके युधिष्ठिर सबसे अधिक गुणवान था इसीलिए उसे युवराज बना दिया गया| तब शकुनि ने लाक्ष के बने हुए धृ में पांडवों को भेजकर उन्हे मारने का प्रयास किया किन्तु विदुर की सहायता से पांचो पांडव और उनकी माता उस घर से बाहर सही सलामत वापस आ गई.

युधिष्ठिर बहुत गुणवान था इसीलिए भीष्म ने युधिष्ठिर को हस्तिनापुर का राजा घोषित करने को कहा लेकिन दुर्योधन यह नही चाहता था इसीलिए उसने अपने पिता से कहा की पिता जी अगर युधिष्ठिर राजा बन गया तो राजसिंहासन युधिष्ठिर के हाथ लग जाएगा और हमेशा के लिए सिंहासन पर पांडवों का अधिकार हो जाएगा और हम कौरवों को हमेशा पांडवों का सेवक बन कर रहना पड़ेगा|

तब धृतराष्ट्र बोले की वत्स युधिष्ठिर हमारे कुल में सबसे बड़ा है इसीलिए सिहासन पर उसका अधिकार है और फिर भीष्म पितामह और राज्य के लोग भी उसी को राजा बनाना चाहते है इसीलिए हम इसमें कुछ नही कर सकते है|

तब दुर्योधन बोला की पिता जी मेने कुछ सोचा है और आप बस मेरी थोड़ी मदत कर दे तब दुर्योधन बोला की मेने वारणावत में एक घर बनवाया जो की लाख, सुखी गान्स, मुंज आदि ज्वलनशील प्रदार्थ से मिलकर बना है आप किसी तरह पांडवों को वारणावत भेज दे|

दुर्योधन ने ऐसा षड्यंत्र रचा था की वहा जाकर वह उन्हें जला कर मार देगा| दुर्योधन के इस षड्यंत्र का विदुर को पता चल गया और विदुर ने जब युधिष्ठिर वारणावत जा रहा था तब उसे सब समझा दिया की वह घर ज्वलनशील प्रदार्थ से मिलकर बना है जरा सी आग लगते ही वह पूरा घर जल कर राख हो जाएगा|

मै एक कारीगर भेजूंगा तुम उसके साथ मिलकर उस घर से वन में निकलने वाली एक सुरंग बना लेना और विदुर की सब बात समझ कर युधिष्ठिर ने उस घर में जाकर पूरी सावधानी से एक सुरंग तैयार करवाई और पांडव रोज ही शिकार के बहाने जाकर अपने रहने के लिए उचित स्थान की खोज करने लगे|

अब जब उन्हें उचित स्थान मिल गया तो पांडवों ने सोचा इस घर से निकलना अब ठीक रहेगा उन्होंने उस रात्री को पुरोचन को किसी तरह बहाने से बुलवाया और उसे बंदी बनाकर कमरे में बंद कर दिया और पुरे भवन में आग लगा दी.

जब हस्तिनापुर यह समाचार पहुचा की वारणावत का पूरा घर जल कर राख हो गया है तब दुर्योधन को बहुत ख़ुशी हुई लेकिन उसने सबके सामने पांडवों के मरने का शोक मनाया.

महाभारत में द्रौपदी का स्वयंवर स्टोरी इन हिंदी – Mahabharat Draupadi Swayamvar in Hindi

द्रौपदी के स्वयंवर में सभी बड़े बड़े राजा महाराजा पधारे हुए थे| एक और भगवान श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई बलराम ठाठ गणमान्य यदुवंशी के साथ में विराजमान थे|

कुछ ही देर बाद हाथ में वरमाला लिए हुए द्रौपदी अपने भाई के साथ सभा में आई, द्रौपदी के भाई ने सभा में आये हुए सभी देशो के राजाओं को कहा की आप सब को उपर स्तंभ पर मछली के प्रतिबिम्ब को देखकर मछली की आख में तीर मारकर अपने आप को प्रस्तुत करना है जो यह कार्य करने में सफल होगा उसी से मेरी बहन द्रौपदी का विवाह होगा.

सभी राजाओ ने मछली की आँख में तीर मारने का प्रयास किया लेकिन एक के बाद एक सभी असफल होते जा रहे थे|

सभा में कर्ण भी थे जेसे ही कर्ण ने धनुष उठाया तभी द्रौपदी बोली की यह सूतपुत्र है मै इसका चुनाव नही कर सकती तब अर्जुन ने धनुष उठाया लेकिन अर्जुन ब्राह्मण था और ब्राह्मण को वहा स्वयंवर में देखकर सब अचंबित थे|

लेकिन ब्राह्मण को शात्रीय से उच्च माना जाता है इसीलिए कोई कुछ नही बोला और अर्जुन ने एक ही बारी में मछली की आख में तीर मार दिया और द्रौपदी ने अर्जुन के गले में माला डाल दी तब वहा बेठे सभी राजा इस बात से क्रोधित हो गये की अर्जुन तो ब्राह्मण है और सब अर्जुन पर हमला बोल पड़े.

पांडवों ने अर्जुन की रक्षा करने में उसकी सहयता की और दुर्योधन भी यह जान चुका था की तीर भेदने वाला अर्जुन ही होगा और उसका साथ देने वाले पांडव|

श्री कृष्ण भी अर्जुन को पहचान गये थे दुर्योधन तो बहुत आश्चर्य था की पांडव वारणावत के लाख के घर से बच केसे निकले| पांडव द्रौपदी को साथ लेकर वहा गये जहा वे अपनी माँ कुंती के साथ रह कर समय व्यतीत कर रहे थे.

अर्जुन से द्वार से ही माँ को पुकार लगाई और कहा माता देखिये हम क्या लाये है| माता ने अंदर से ही बोल दिया की जो भी लाये हो आपस में बाट लो|

जब बाद में कुंती को पता चला की उसके यहा वधु आई है उन्हें बहुत पश्ताप हुआ किन्तु माता के वचनों को सत्य करने के लिए द्रौपदी ने पांचो को अपना पती स्वीकार कर लिया उसके कुछ समय पश्चात् वहा श्रीकृष्ण भी आ पहुचे और उन्होंने अपनी बुआ कुंती के चरण स्पर्श किये और आशीर्वाद लिया| अपने भाई पांडवों के गले मिले.

श्री कृष्ण सभी से मिलकर द्वारका नगरी चले गये| द्रौपदी के स्वयंवर में द्रुपद और धृष्टद्युम्न को शक हो गया था की ब्राह्मण के वेश में ये पांडव ही है इसीलिए द्रुपद ने धृष्टद्युम्न के द्वारा ब्राह्मणों को राजप्रसाद के लिए बुलवाया|

उन्होंने पांडवों को पहले तो राजकोष दिखाया लेकिन पांडवों ने हीरे मोती देखकर किसी प्रकार की कोई रूचि नही दिखाई इसके बाद उन्हें शस्त्र ग्रह दिखाया शस्त्र ग्रह में उन्होंने पूरी रूचि दिखाई तब द्रुपद समझ गया की ये कोई योधा ही है|

द्रुपद ने पांडवों को कहा हे आर्य आप ब्राह्मण तो नही है कृप्या आप मुझे आपना सही परिचय दीजिये तब युधिष्ठिर बोले की हम पाण्डु पुत्र पांडव है तब द्रुपद को यह जानकर बहुत ख़ुशी हुई वो बोले की मै चाहता था की मेरी पुत्री का विवाह पांडू पुत्र अर्जुन से हो तब युधिष्ठिर बोले की महाराज, द्रोपती का विवाह तो हम पांचो भाइयो से होना है| यह सुनकर द्रुपद आश्चर्यचकित हुए|

एक स्त्री अनेक पती ऐसा पहली बार हो रहा है तभी सभा में वेदव्यास जी आये और उन्होंने बताया की पिछले जन्म में द्रोपती ने भगवान शिव की भक्ति की थी जिसके फल स्वरूप द्रोपती को पांच प्रक्रम पती मिलने थे|

वेदव्यास जी के वचनों को सुनकर द्रुपद का संदेह दूर हो गया….

प्रिय पाठकों, यह महाभारत का आधा भाग है| आपको महाभारत का बाकी अधूरा भाग आपको नीचे दिए गये लिंक पर क्लिक करके मिलेगा.

यहा हमने महाभारत कथा बहुत ही सरल शब्दों में लिखी गयी है आप आसानी से समझ सकेंगे और अगर आपको यह लेख पसंद आया हो तो इसे शेयर जरूर करे और साथ में कमेंट करना बिलकुल ना भूले.

आईये, अंत में लेख समाप्त करने से पहले महाभारत के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य के विषय में चर्चा कर लेते है| यह चर्चा आपकी जनरल नॉलेज को बढ़ाएगी.

प्रशन 1 : पांडु के पिता का नाम क्या था ?
उत्तर : महाभारत के अनुसार पाण्डु अम्बालिका और ऋषि व्यास के पुत्र थे |

प्रशन 2 : कुन्ती के कितने पुत्र थे ?
उत्तर : कुंती के 4 पुत्र थे| कर्ण, युधिष्ठर, भीम और अर्जुन

प्रशन 3 : कुंती के सबसे बड़े पुत्र का नाम क्या था ?
उत्तर : सूर्यपुत्र महारथी कर्ण

प्रशन 4 : महाभारत में कुंती किसकी पुत्री थी ?
उत्तर : (कुंती) महाराज शूरसेन की बेटी थी|

प्रशन 5 : अर्जुन के पिता का नाम क्या था ?
उत्तर : महाराज पाण्डु

प्रशन 6 : विदुर की माता का क्या नाम था ?
उत्तर : दासी पुत्र (इनकी माता का नाम उपलब्ध नही है)

प्रशन 7 : महाभारत में धृतराष्ट्र के कितने पुत्र थे ?
उत्तर : सौ पुत्र और एक पुत्री

प्रशन 8 : धृतराष्ट्र की पुत्री का नाम क्या है ?
उत्तर : दुःशला

प्रशन 9 : महाभारत में धृतराष्ट्र के पिता का क्या नाम था ?
उत्तर : विचित्रवीर्य |

प्रशन 10 : शकुनि की बहन का नाम क्या है ?
उत्तर : गांधारी

प्रशन 11 : भीष्म की माता का क्या नाम था ?
उत्तर : गंगा

प्रशन 12 : भीष्म के पिता का नाम क्या था
उत्तर : शांतनु

प्रशन 13 : भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान किसने दिया था ?
उत्तर : उनके पिता शांतनु ने

प्रशन 14 : भीष्म पितामह का असली नाम क्या था ?
उत्तर : देवव्रत

प्रशन 15 : राजा पांडु की कितनी पत्नियां थीं ?
उत्तर : राजा पाण्डु की दो पत्नियाँ थी | कुन्ती और माद्री

भारत का इतिहास ⇓

Recent Articles

Related Stories

10 Comments

  1. This article of yours is giving complete knowledge….which will going to be useful for school going students. I will surely gonna share it with my brother. Keep updating

  2. सर आपका ये लेख अन्य सभी लेखों से सबसे ज्यादा प्रभावित करता है| धन्यवाद आपका जो आज के समय में हमें उस समय का ज्ञान दे रहें हिमांशु सर लगे रहिए|

Leave A Reply

Please enter your comment!
Please enter your name here